Monday 29 June 2009

मौत से सामना!!

दुनिया से अलग अपनी दुनिया में मगन,
चला जा रहा था ख्यालों में मन,
तभी किसी के चीखने की आवाज़ आई,
मैंने गर्दन घुमाई,
तब तक किसी चोट से आहत था।
देखा मौत सामने खड़ी थी !!
मौत, गुर्राई!!, चिल्लाई !!
बोली देखकर नही चल सकते,
मैं ड्यूटी पे हूँ मुझे किसी को लेकर जाना है,
तुम्हारे कारण लेट हो गई।
मैं मौत से अनजान अपने ख्यालों से निकला,
शायद उस समय मेरे चेहरे पर मासूमियत का भाव था खिला,
जिसे देख मौत बोली मुझे रुलाएगा क्या?
हट जा मेरे रास्ते से,
फिर किसी दिन मिलूंगी फुर्सत से,
शायद तब तू समझ पायेगा मौत से टकराने का मतलब।
मौत ने मुस्कुरा कर विदा ली,
मेरे नेत्र विस्मय भाव से उसे ओझल होते हुए देखते रहे,
कुछ ही पलों में मैं वापस अपने ख्यालों में था।
मुझे भला मौत से क्या लेना-देना था,
मैं तो ज़िन्दगी के सपनों और सपनों की ज़िन्दगी में जी रहा था!!!!!!!!

Sunday 28 June 2009

'न्यूयार्क'!.

आज फ़िल्म न्यूयार्क देखी.शुरुआत में लगा जैसे पिछले साल आई फ़िल्म दोस्ताना का सीक्वेल देख रहे हों.फ़िल्म ने रफ़्तार पकड़ी और लगा कि एक और स्वस्थ दोस्ती की मिसाल सामने आएगी.हुआ भी यही लेकिन सन्दर्भ जटिल हो गया.मध्यांतर तक आते-आते लगा कि एक बार फिर किसी ने हृदय में लगे पुराने घाव को कुरेद दिया हो.इसके पहले कई फिल्में ९/११ घटना को आधार बना कर निर्मित की गई हैं.लेकिन न्यूयार्क में खिसियानी बिल्ली के रूप में अमेरिका का चरित्र उजागर हुआ है. ९/११ के बाद अमरीकियों द्वारा एक मजहब के लोगों पर किए गए अत्याचारों और उसके बाद उन बेक़सूर लोगों के समस्त मानसिक तथा सामजिक समस्याओं को उजागर करने वाली दास्तान है 'न्यूयार्क'!. फ़िल्म में एक आम व्यक्ति के अन्दर परिस्थितिजन्य आतंकवाद की प्रवृत्ति की प्रक्रिया को अत्यन्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के साथ चित्रित किया गया है.टीस इस बात की है कि इससे कहीं न कहीं कोई अपना ही प्रभावित हुआ है.और यदि किसी ज़बरदस्ती के कारण किसी स्वस्थ व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है तो उससे बड़ा कोई अपराध नही हो सकता.मैं यह सिर्फ़ भारतीय भाइयों के लिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि वैश्विकरण के इस दौर में हम किसी देश की सीमाओं तक बंधे नही रह सकते बल्कि हमें तो अपनी सोच और संबंधों की सीमाओं का भी विस्तार करना होगा. वैसे यह हमारे लिए कठिन नही है क्योंकि "वसुधैव कुटुम्बकम" प्राचीन काल से ही भारतीय परम्परा का नारा रहा है.
रोंगटे खड़े कर देने वाले अत्याचारों के कारण हर व्यक्ति को सोचने पर मजबूर किया है फ़िल्म 'न्यूयार्क' ने.गला रूंध जाता है तो आँखें नम पड़ जाती हैं.क्या है ये सिस्टम जिसमें कॉलेज में रोजाना अपनी जान कि बाजी लगाकर अमेरिकी झंडा फ़हराने वाले समीर शेख को ९/११ कि घटना के बाद उन्ही अमरीकियों के कोप का भाजन बनना पड़ता है और इसका कारण सिर्फ़ उसका मजहब है."स्वतंत्रता,समानता और भाईचारे" का उद्घोष करने वाली अमेरिकी व्यवस्था से क्या ऐसी अपेक्षा कि जा सकती है और क्या उसकी नज़र में सभी समान हैं?
इस तथ्य को फ़िल्म के अंत में इरफान खान के कथन कि "अमेरिका में ही एक आतंकवादी का लेबल लगे व्यक्ति के बेटे को स्कूल टीम के चैम्पियन के रूप में स्वीकार किया जा सकता है"और फिर राष्ट्रपति बराक ओबामा के निर्णय को भी लिखित रूप में परदे पर रेखांकित किया जो निश्चय ही आतंकवाद के प्रति एक बदलती तस्वीर तथा नए युग की शुरुआत ओर संकेत करता है. साथ ही इस वैश्विक समस्या(आतंकवाद) की जड़ में जाकर उसके कारणों की पड़ताल तथा उससे निजात पाने के तरीके की खोज की मांग 'न्यूयार्क' में निहित है.
निश्चय ही हम भाग्यशाली हैं कि हम एक धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक राष्ट्र के नागरिक हैं और ये हमारे लिए सम्मान की बात है लेकिन आज समय आ गया है की हम सिद्धान्तों से सिर्फ़ मानसिक स्तर तक ही न बंधे रहें बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी इसे आत्मसात कर इंसानियत की एक नई मिसाल रखें.हमारा यही प्रयास होना चाहिए कि हम ऐसा कोई काम न करे जिससे किसी का शोषण हो रहा हो।यही सोच 'न्यूयार्क' के उद्देश्य तथा 'मानवता एक धर्म' के सिद्धांत को पुष्ट करेगी।
धन्यवाद...................................................आपका...........................................................

Tuesday 23 June 2009

हाय दुनिया ये दुनिया बड़ी गोल है!

यह तो मेरी शुरुआत है !
कोशिश करूँगा की दुनिया की परिधि को इन्ही पैरों के तले पीछे निकलता हुआ महसूस करूँ।
संपूर्ण पृथ्वी की संस्कृतियाँ मेरी आत्मा में अमरता का एहसास भर दें और मैं इन इन्द्रधनुषी
रंगों के माध्यम से सभी को प्यार और मोहब्बत का पैगाम देता रहूँ।
यही मेरी पूंजी हो और मेरी तरफ़ से संस्कृती को एक धरोहर।
आख़िर इसी का नाम तो ज़िन्दगी है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
धन्यवाद आपका....................