Tuesday 19 October 2010

दुर्गा(नारी के शक्ति रूप की)पूजा : छद्म या वास्तविकता !!!!!!!!!

प्रत्येक वर्ष नवरात्री के समय माँ-दुर्गा के विभिन्न रूपों की उपासना की जाती है. दुर्गा की उपासना नारी के शक्ति रूप में की जाती है. नारी की शक्ति से तात्पर्य, नारी की जन्म देने की क्षमता से है जो उसे पुरुष से पृथक करती है. अपनी जनन क्षमता के कारण ही संहार करने की शक्ति की वह प्रथम अधिकारिणी है. क्योंकि न्याय की दृष्टि से किसी वस्तु को नष्ट करने का पहला अधिकार उस व्यक्ति का होता है जिसने उस वस्तु का सृजन किया है. जहाँ तक ऐतिहासिक तथ्य का प्रश्न है दुर्गापूजा का सन्दर्भ, माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर नामक राक्षस के वध से जुड़ा हुआ है और शायद तभी से परंपरा रूप में हम दुर्गापूजा का अनुकरण करते रहे हैं.
स्त्री में देवत्व का आरोपण वस्तुतः उसकी साधारण मानवी की प्रतिष्ठा का निषेध करता है. क्योंकि यह तयशुदा बात है कि देवी के समकक्ष स्थापित होने के पश्चात उसके अन्दर साधारण मानव को उपलब्ध सहज सुलभ आवश्यकताएं, इच्छाएं, वासनाएं नहीं हो सकतीं. साथ ही देवी रूप में उसका धातु-पत्थर से मूर्तीकरण उसे मानवीय संवेदनाओं से परे कर देना है.
इस प्रकार एक साधारण स्त्री को मानव सुलभ अधिकारों से वंचित कर देवी के रूप में चित्रित करना समाज का सोचा समझा षड़यंत्र प्रतीत होता है. स्त्री को देवी बनाकर और स्वयं के लिए समस्त सांसारिक भोगों को प्राप्य घोषित कर पुरुष ने अपने एकाधिकार को सुरक्षित करने का मार्ग बनाया है. वरना देवी के रूप में प्रतिष्ठित करने के बाद भी समाज में स्त्री को दोयम दर्जा नहीं प्रदान किया गया होता.
    स्त्री की पूजा सिर्फ उतनी ही होती है जितनी प्राकृतिक रूप में संचालित किये जाने वाले कर्मकांडों में प्रदर्शित होती है. यदि ऐसा होता तो वर्ष के १८ दिन (* दिन), देवी के समकक्ष स्थापित होकर बाकी के ३४७ दिन उसे शोषण, प्रताड़ना तथा वंचना का दंश  झेलना पड़ता. जीवन के सुन्दर समतल में अमृत स्रोत सी प्रवाहित होने वाली स्त्री को सहज मानवीय गरिमा उपलब्ध कराना तो दूर उसे मानवीय स्पंदनों से भी वंचित कर दिया जाता है.
आज की स्त्री स्वंत्रता और मुक्ति की कामिनी है अतएव उसे स्त्रीत्व और मातृत्व की परंपरागत बंदिशें भी स्वीकार्य नहीं हैं. तो वह अपनी सत्ता को धातु की मूर्तियों में कैसे विसर्जित कर सकती है. आज नारी रूढ़िगत मान्यताओं और जंजीरों से निकलकर पुरुषों के सम स्तर पर खड़ी हुई है. उसने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चलना सीख लिया है. यही नहीं नारी की ऊपर उठने की इस अन्तर्निहित शक्ति को, महिला सशक्तिकरण के रूप में चल रहे राजनैतिक प्रयासों का भी बल मिला है. परन्तु स्त्री को शक्ति के रूप में (देवी रूप में) चिह्नित करते ही वर्तमान समय में स्त्री/नारी सशक्तिकरण की चूलें भी हिल जाती हैं.
दुर्गा काली का खड्गधारी शक्ति रूप स्त्री को शक्ति को प्रातीतिक रूप में चिह्नित भले ही करता हो परन्तु मृदा/धातु की मूर्तियों में जिस स्त्री शक्ति का आरोपण पुरुष-सत्ता शासित समाज करता है, उसी शक्ति की मानविक रूप में जो प्रताड़ना तथा उत्पीड़न उसी पुरुष द्वारा होता है वही कठोर यथार्थ है. इस कठोर यथार्थ में मूर्तियों में तो स्त्री देवी है परन्तु मानवीय देह के प्रश्न पर उसके प्रति व्यवहार, मानवीय गरिमा के भी प्रतिकूल है. यानि देवत्व का आरोपण, कुल मिलाकर स्त्री की वंचना को एक पौराणिक जामा पहनाना है. जो यह तर्क प्रतिपादित करता है कि देवी होने के कारण स्त्री सांसारिक सुखों, भोगों, इच्छाओं, अभिलाषाओं आदि की अधिकारिणी नहीं है, जो कि मानव को सहज सुलभ हैं.
मार्क्स ने कहा था कि स्त्री को देवी कहना, उसका सबसे बड़ा अपमान है. आज भारत में सबसे ज्यादा मार्क्सवादी पश्चिम बंगाल में हैं और वहीँ पर दुर्गा पूजा का पर्व सर्वाधिक हर्षोलास के साथ मनाया जाता है. ऐसे में कथनी और करनी के बीच का बड़ा अंतर इस बात कि ओर संकेत करता है दुर्गापूजा, माँ दुर्गा की महिषासुर मर्दिनी के रूप में उपासना मात्र है कि स्त्री को शक्ति रूप में पूजने अथवा स्थापित करने की (वैचारिक) इच्छा !!!!

7 comments:

  1. यही यथार्थ है, बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है आपका ये लेख!

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  2. im glad you analysed this aspect of the notion of womanhood....

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  3. सटीक विश्लेषण किया है ... कथनी और करनी में अन्तर कि वजह से ही स्त्रियां शोषण का शिकार हैं ...

    आपने मेरे ब्लॉग पर आ कर "याग्यसैनी " पर अपनी प्रतिक्रिया दी ...उसके लिए आभार ..आप जैसे पाठकों कि टिप्पणियाँ ही रचनाकार को प्रोत्साहन देती हैं ..आभार

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  4. विडंबनाएं ही विडंबनाएं हैं भारतियों के गगनचुंबी विचारधारा से ओतप्रोत दर्शन में और उनके दैनिक व्यवहार में |

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  5. Sundar aur sargarbhit lekh...Badhai ke Patra hain sir aap

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