Wednesday 30 May 2012

दिल की आवाज़!!!!















दुनिया की भीड़ से अलग,
हरियाली बीच बैठा मैं.
मन कुछ सोचता,
पर प्रकृति में खोया मैं.. 
तभी एक चिड़िया चहचहाई,
मन का तानपुरा छिड़ गया !!
मैंने नज़रें उठाईं..
देखा तो एक डाल पर,
चिड़िया कुछ ठान कर,
घोंसला बनाने में लगी..
अचानक एक विचार कौंधा.. 
दुनिया के दस्तूर पर,
जो प्रकृति में स्थित,
अपने सहचरों का
ख़याल न रख रही थी.. 
मानव सुखों के लिए पेड़ कटे,
न जाने कितनों के घरौंदे टूटे..
इंसान ने 
अपने घरों को बसाया,
दूसरों के आशियानों को जलाया.. 
जंगल के जंगल कटे,
असंख्य जानवर घटे..
आज यह घोंसला बनेगा,
कल शायद यह पेड़ भी कटेगा.. 
दूसरों के घर उजाड़कर,
ईंट-पत्थरों का नया शहर बसेगा..
इस सोच में डूबे हुए
लगा किसी ने मुझे पुकारा
वह पेड़ था..
वह चिड़िया थी.. 
या मेरे दिल की आवाज़ थी........

6 comments:

  1. बहुत सुंदर, बेहतरीन। यही है प्रकृति प्रेम।

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  2. भाई, बहुत दिन बाद।

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  3. atisundar...aur apke chitr chunav ne yah bata diya ki aap chintansheel hain...

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  4. सुन्दर रचना...प्रकृति प्रेम और मानव द्वारा नष्ट की जा रही प्राकृतिक सम्पदा पर क्षोभ प्रदर्शित करती हुई एक सशक्त रचना.....

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  5. Man mein vichar uthana ek alag baat hai, par use shabdon mein pirona, ye sabke bas ki baat nahi hai, ye toa us khuda ki den hai jo kisi kisi ko deta hai aur jo baat man se utar kar dil tak aaye , aur dil se utar kar jubaan par, aur jubaan se kagaz par, wo kagaz ka panna ek din amar ho jaata hai..........aapki manzil bhi door nahi hai........

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  6. the beauty of your thoughts have taken you to such a deep retrospection which should be dwelling in each and every mind in the contemporary time where the selfish goals have become so significant that everything else has turned apathetic!! a very good attempt at reaching out to people in such a simple and clear manner.!! keep the good work up! :)

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