Sunday, 2 February, 2014

आखिर दिल ही तो है!!!!

मैंने आज एक मित्र द्वारा लिखीं कुछ पंक्तियाँ पढ़ीं ।  जब मैं अकेला बैठा था तभी अचानक मन न जाने भूत के किस पड़ाव पर जाकर ठहरने लगा। पल भर के भूत से वर्तमान तक के सफ़र ने जैसे ज़माने के बदलते रंग-रूप से रुबरु करा दिया। वैसे बदलाव तो संसार का नियम है यानि संसरण अर्थात निरंतर आगे बढ़ने की प्रक्रिया।
ज़िन्दगी में लोग आए लोग साथ चले और लोग बिछड़ गए.....हमारी अवस्था बदलती गयी और एक दिन लगा जैसे दुनिया ही बदल गयी।
ऐसा ख़ास तौर पर तब हुआ जब पुरानी यादों के किसी झोंके ने हमारे भोगे हुए इतिहास के पन्ने को हमारे सामने लाकर रख दिया।और हम "तब और अब" की तुलना करने लगे।।।।ज़िन्दगी की गणित शुरु हुई...लगा जीवन की इस दौड़ में भले ही हम सबसे आगे निकल गए हों, हमने खोया ज्यादा और पाया कम है।
फिर भी यदि हम बदलाव की ओर गौर करें तो पाते हैं कि यह स्वाभाविक है।। पहले हम पैदल चले फिर बैलगाड़ी,साइकिल फिर मोटर गाड़ी ने तो ज़िन्दगी को रफ़्तार ही दे दी और आज तो हमारे पाँव ही ज़मीन पर न रहे हम हवा में उड़ने लगे हैं।
निश्चय ही हमने अपना समय बचाया है लेकिन गौर करें तो पहले की तुलना में आज हमारे पास अपनों के लिए समय कम है। इसमें दोष हमारा नहीं लगता दोष तो लगता है सभ्यता की रफ़्तार का जिसने हमें तार से बेतार कर कब ब्लूटूथ बना दिया पता ही नहीं चला।। हमनें भी सभ्यता की तेज़ी से हिंडोले मारती पतंग की डोर को कस कर थामे रखा।। सभ्यता की पतंग तन कर ऊंची होने लगी तब हमने संस्कृति की चरखी से उसे धीरे-धीरे ढील दी क्योंकि हमें डर था कि कहीं हम हत्थे से ही न उखड़ जाएँ।
इन सब वैचारिक झंझावातों से निकल कर भी यदि हम सोचें तो यह बात समझ में नहीं आती कि भले ही हमने अपने जीवन में कितनी भी ऊँचाइयाँ छू लीं हों,हमें सब कुछ पाने का एहसास हो फिर भी हमारा मन गाँव की मिटटी में ही क्यों ज्यादा रमता है।। क्यों नहीं भूल पाए हम चूल्हे की रोटी का सोंधापन,क्यों आज भी तलाशते हैं माँ के हाथ की दाल का स्वाद।।।।। और न जाने क्या क्या????
चलिए इन सबको छोड़ते हैं वरना मन दुखी होगा।।
चलिए अब कुछ रोचक हो जाये।।हमारे जीवन में एक चीज़ तो ख़ास हुई ही है। हमें मधुबाला अच्छी लगती थी तो आज भी हमारा दिल करीना पर आ जाता है... हो भी क्यों न ? आखिर दिल ही तो है!!!!!

7 comments:

  1. Bhaut khoob kaha manish Bhai aaj bhoutikta Ki es andhi doud mein hum sab kuchh pane Ke chakker mein bahut kuchh khote ja rahe Hain....

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  2. बहुत सुन्दर एवं स्वभाविक आलेख बन पड़ा है

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  3. ye lekh padh ker kisi ki likhi wo panktiyan yaad aa gai " Bachpan me mere paas ghadi nahi hoti thi per samay bahut tha, aaj jub pere paas mehngi ghadi hai per samay nahi hai "
    Manish ji aapne bahut hi sunder chitran kiya hai jeevan darshan ka, is lekhni ko na kewal banay rakhiye bulki isko aur unchai tuk le jaiye.

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  4. भैया आपका ये लेख मुझे बहुत पसंद आया हमारे अतीत और वर्तमान के बीच तकनिकी विकास ने एक ऐसी दुरी पैदा कर दी है जिसे मन की हमारी ए उड़ान समझ नहीं पा रहा है। जिस विकास की दौड़ ने हमारा एक तरफ समय बचाया वही हमारा समय खुद ही ले लिया नतीजा ये हुआ की हम अपनों के लिए कम अपने लिये ज्यादा जीने लगे। पत्रों की भावनाए खत्म सी हो गई । जहा तक बात दिल की है भैया ये दिल का नहीं हमारे आँखों का फेर है जो कभी मधुबाला को तो कभी करीना को पसन्द कर लेता है। दिल तो एक बार जिसे पसंद कर ले उसे जीवन भर बस वही पसन्द आय वो चाहें मधुबाला हो या करीना । इसी लिए तो दिल दिल है और मन बेचारा मन ।। शुभकामनाओ क साथ आपका भाई ।।।।।।।।।।।।।े

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  5. Bhai aapke dil ki tarah dher saari yadein aur sapne isme samahit hain.hamesha aapke sapne aaki yadoon se zyada rahein

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  6. दरअसल तकनीकी विकास संवेदनाओं की लाश पर ही होता आया है।

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